उत्तर प्रदेश में यूरिया संकट: किसान लाइन में लाठी खाते, सरकार नैनो यूरिया के सपनों में खोई
उत्तर प्रदेश में यूरिया संकट: किसान लाइन में लाठी खाते, सरकार नैनो यूरिया के सपनों में खोई

लखनऊ।उत्तर प्रदेश में यूरिया खाद को लेकर भारी हाहाकार मचा हुआ है। सहकारी समितियों और सरकारी गोदामों के बाहर किसानों की लंबी कतारें लगी हैं। कई किसानों को एक बोरी खाद पाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है और कहीं-कहीं हालात इतने बिगड़े कि किसानों को पुलिस की लाठियाँ भी खानी पड़ीं। किसानों का आरोप है कि सरकार और विभाग जानबूझकर परंपरागत यूरिया की कमी कर रहे हैं ताकि नैनो यूरिया को जबरन बेचा जा सके।
गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, रायबरेली और हरदोई सहित कई जिलों में किसानों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि वोट डालने के लिए भी लाइन लगानी पड़ती है और अब खाद लेने के लिए भी। हफ्तों चक्कर काटने के बाद भी सिर्फ एक बोरी यूरिया मिल पाती है, जबकि खेत में खड़ी फसल खाद के बिना सूखने की कगार पर है। एक किसान ने गुस्से में कहा कि उद्योगपति और बड़े बिजनेसमैन को लाइन में नहीं लगना पड़ता, किसान ही है जिसे हर बार धक्के खाने पड़ते हैं – खाद लेने से लेकर फसल बेचने तक।
युवा भारती के अध्यक्ष डॉ. लव कुश पटेल ने इस पूरे हालात पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यह संकट कृत्रिम है और सरकार इसे रोकने में पूरी तरह विफल रही है। “जब खाद समय पर नहीं मिल पा रही, जब किसान को अपने ही गाँव में लाठी खाकर एक बोरी खाद लेनी पड़ रही है, तब यह साफ है कि व्यवस्था किसानों को मजबूरी में नैनो यूरिया की ओर धकेल रही है। यह किसान के साथ धोखा है और अन्नदाता के अपमान की पराकाष्ठा है। सरकार को शर्म आनी चाहिए।”
डॉ. पटेल ने सवाल उठाया कि जब समय पर खाद उपलब्ध नहीं कराई जा सकती तो किसानों से पैदावार की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जब फसल तैयार होती है तो खरीद की गारंटी क्यों नहीं मिलती? आखिर किसान कब तक खाद के लिए लाइन में लगेगा और लाठियाँ खाएगा? उन्होंने कहा कि किसानों की पीड़ा बताने वाला न कोई अधिकारी है, न कोई जनप्रतिनिधि और न ही बड़े मीडिया घराने। यह चुप्पी अन्नदाता की आवाज़ को दबाने की साज़िश है।
उन्होंने आगे कहा कि युवा भारती की टीमें गाँव-गाँव जाकर किसानों की समस्याएँ दर्ज कर रही हैं और प्रदेश सरकार के साथ-साथ केंद्र तक यह संदेश पहुँचाने का काम करेंगी। “हमारा संगठन किसानों की आवाज़ बनकर खड़ा है। अगर सरकार ने इस संकट का हल तुरंत नहीं निकाला तो अन्नदाता खेत से लेकर सड़क तक हर जगह सरकार को आईना दिखाने को मजबूर होगा,” डॉ. पटेल ने कहा।
यह स्थिति सिर्फ एक प्रशासनिक नाकामी नहीं बल्कि अन्नदाता के साथ किया गया धोखा है। वही किसान जिसके भरोसे यह देश जिंदा है, वही आज सबसे ज्यादा अपमानित है। सवाल यह उठता है कि क्या यही डबल इंजन सरकार का विकास है? क्या यही कृषि क्रांति है जिसका वादा किया गया था? क्या यही अन्नदाता का सम्मान है जिसके नारे गूंजते हैं?
प्रदेश में खाद संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है और किसानों का आक्रोश भी उसी अनुपात में बढ़ रहा है। अगर यही हाल रहा तो सरकार को अब यह समझ लेना चाहिए कि किसान सिर्फ वोट बैंक नहीं बल्कि इस देश की रीढ़ है और अगर रीढ़ को तोड़ा गया तो सत्ता की इमारत खुद-ब-खुद ढह जाएगी।




