पूर्वांचल में कमल की जीत आसान नहीं, सहयोगी अपना दल (एस) ब अन्य क्षेत्रीय पार्टियों से कड़ी चुनौती मिलने की संभाबना - Latest News & Updates - Rohilkhand Prabhat News

पूर्वांचल में कमल की जीत आसान नहीं, सहयोगी अपना दल (एस) ब अन्य क्षेत्रीय पार्टियों से कड़ी चुनौती मिलने की संभाबना

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लखनऊ-

उत्तर प्रदेश में हो रहे पंचायत चुनाव  में पूर्वांचल  में कमल  की जीत आसान नहीं दिख रही है। 2014 और 2019 में केंद्र की सरकार और 2017 में उत्तर प्रदेश की गद्दी पर आसीन होने के लिए भारतीय जनता पार्टी  ने जिन क्षेत्रीय दलों की मदद ली थी, आज वो क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा से दूर हैं और जो साथ हैं,  वो भी पंचायत चुनाव अलग लड़ रही हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव में ‘कमल’ को विपक्ष के साथ-साथ अपने ही सहयोगी दलों  से कड़ी चुनौती मिलने की संभावना है।

जानकारों का कहना है कि नए कृषि कानून और महंगी खाद की वजह से किसानों में गहरी नाराजगी है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत, महंगाई से आम जनता के साथ-साथ किसान और मजदूर भी परेशान है। कोरोना की वजह से पिछले साल भर से रोजगार में गिरावट का असर भी पंचायत चुनाव में दिखेगा। 

बता दें कि 2014, 2017 और 2019 का लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और अपना दल (एस) ने साथ-साथ लड़ा था। वर्तमान में अपना दल एस के 2 सांसद (मिर्जापुर व सोनभद्र) और 10 विधायक हैं। वाराणसी से प्रयागराज और आसपास के हर जिला (वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर, प्रतापगढ़, फतेहपुर, प्रयागराज, सिद्धार्थनगर) में अपना दल एस के एक-एक विधायक हैं। प्रतापगढ़ में पार्टी के 2 विधायक हैं। इन इलाकों में अपना दल एस की मजबूत पैठ है। इसके अलावा पार्टी ने मध्य उत्तर प्रदेश, तराई क्षेत्र, कानपुर मंडल और आजमगढ़ मंडल में भी अपनी जमीन तैयार की है। ऐसे में इन इलाकों में अपना दल (एस) को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। कई सीटों पर अपना दल एस सामने वाले मजबूत प्रत्याशी को हराने में भी बड़ी भूमिका निभाएगी।

सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी

भाजपा और सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 2017 का विधानसभा चुनाव मिलकर एक साथ लड़ा। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद दोनों दल अलग हो गए। वर्तमान में पार्टी के चार विधायक हैं। पूर्वांचल के वाराणसी, अंबेडकर नगर, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, देवरिया, बलिया इत्यादि जिलों में इस पार्टी की मजबूत पकड़ है। पिछले साल हुए विधानसभा के उपचुनाव में घोसी और जलालपुर सीट पर सुभासपा के प्रत्याशी को 8-8 हजार से ज्यादा वोट मिले थे, जिसकी वजह से घोसी में सपा और जलालपुर में बसपा को भारी नुकसान हुआ। फिलहाल सुभासपा ने 8 दलों का गठजोड़ किया है और भाजपा के खिलाफ मुखर हो गई है। अत: पंचायत चुनाव में भी इस पार्टी का गहरा असर दिखेगा।

निषाद पार्टी:

2018 में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। गोरखपुर में निषाद पार्टी के मुखिया डॉ.संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को समाजवादी पार्टी ने चुनाव मैदान में उतारा था और सीएम योगी के गढ़ में साइकिल दौड़ पड़ी थी। हालांकि 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान सपा और निषाद पार्टी के बीच दूरियां होने पर निषाद पार्टी ने भाजपा से गठबंधन कर लिया था। फिलहाल प्रवीण निषाद संत कबीर नगर संसदीय क्षेत्र से भाजपा से सांसद हैं। लेकिन अब भाजपा और निषाद पार्टी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। डॉ.संजय निषाद भाजपा पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने कई स्थानों पर जिला पंचायत सदस्यों को अपना समर्थन दिया है। पूर्वांचल के लगभग हर जिला में निषाद समाज की अच्छी खासी तादाद है। फिलहाल निषाद समाज को अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस और सपा भी पूरी कोशिश कर रही हैं।बाकी चुनाव के परिणाम आने पर स्पस्ट हो जायेगा, 


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